The Gupta Period Beginning Kumar Gupta 1 and Skanda Gupta - INDJOBSGROUP

Sunday, September 15, 2019

The Gupta Period Beginning Kumar Gupta 1 and Skanda Gupta

The Gupta Period Beginning Kumar Gupta 1 and Skanda Gupta 

Gupta Period गुप्त काल
सन् 320 ईस्वी में चन्द्रगुप्त प्रथम अपने पिता घटोत्कच के बाद राजा बना जिसने गुप्त वंश की नींव डाली । इसके बाद समुद्रगुप्त (340 इस्वी), चन्द्रगुप्त द्वितीय, कुमारगुप्त प्रथम (413-455 इस्वी) और स्कंदगुप्त शासक बने । इसके करीब 100 वर्षों तक गुप्त वंश का अस्तित्व बना रहा । 606 इस्वी में हर्ष के उदय तक किसी एक प्रमुख सत्ता की कमी रही । इस काल में कला और साहित्य का उत्तर तथा दक्षिण दोनों में विकास हुआ । इस काल का सबसे प्रतापी शासक "समुद्रगुप्त" था जसके शासनकाल में भारत को "सोने की चिड़या" कहा जाने लगा।

ग्यारहवीं तथा बारहवीं सदी में भारतीय कला, भाषा तथा धर्म का प्रचार दक्षिणपूर्व एशिया में भी हुआ ।
 Kumar Gupta 1 कुमार गुप्त-1
चंद्रगुप्त द्वितीय की मृत्यु के बाद उसका पुत्र कुमारगुप्त राजगद्दी पर बैठा। यह पट्टमहादेवी ध्रुवदेवी का पुत्र था।  इसके शासन काल में विशाल गुप्त साम्राज्य अक्षुण्ण रूप से क़ायम रहा।  बल्ख से बंगाल की खाड़ी तक इसका अबाधित शासन था। सब राजा, सामन्त, गणराज्य और प्रत्यंतवर्ती जनपद कुमारगुप्त (Kumar Gupta )के वशवर्ती थे। गुप्त वंश की शक्ति इस समय अपनी चरम सीमा पर पहुँच गई थी। कुमारगुप्त को विद्रोही राजाओं को वश में लाने के लिए कोई युद्ध नहीं करने पड़े।
उसके शासन काल में विशाल गुप्त साम्राज्य में सर्वत्र शान्ति विराजती थी। इसीलिए विद्या, धन, कला आदि की समृद्धि की दृष्टि से यह काल वस्तुतः भारतीय इतिहास का 'स्वर्ण युग' था। अपने पिता और पितामह का अनुकरण करते हुए कुमारगुप्त ने भी अश्वमेध यज्ञ किया। उसने यह अश्वमेध किसी नई विजय यात्रा के उपलक्ष्य में नहीं किया था। कोई सामन्त या राजा उसके विरुद्ध शक्ति दिखाने का साहस तो नहीं करता, यही देखने के लिए यज्ञीय अश्व छोड़ा गया था, जिसे रोकने का साहस किसी राजशक्ति ने नहीं किया था। कुमारगुप्त ने कुल चालीस वर्ष तक राज्य किया।

उसके राज्यकाल के अन्तिम भाग में मध्य भारत की नर्मदा नदी के समीप 'पुष्यमित्र' नाम की एक जाति ने गुप्त साम्राज्य की शक्ति के विरुद्ध एक भयंकर विद्रोह खड़ा किया। ये पुष्यमित्र लोग कौन थे, इस विषय में बहुत विवाद हैं, पर यह एक प्राचीन जाति थी, जिसका उल्लेख पुराणों में भी आया है। पुष्यमित्रों को कुमार स्कन्दगुप्त ने परास्त किया।
Skanda Gupta स्कंदगुप्त
स्कंदगुप्त (455-467 ई.) गुप्त सम्राट् कुमारगुप्त प्रथम महेंद्रादित्य का पुत्र था। अपने पिता के शासनकाल में ही इसने प्रबल पुष्यमित्रों को पराजित करके अपनी अद्भत प्रतिभा और वीरता का परिचय दे दिया था। यह कुमारगुप्त की पट्टमहिषी महादेवी अनंत देवी का पुत्र नहीं था। यह उनकी दूसरी रानी से था। पुष्यमित्रों का विद्रोह इतना प्रबल था कि गुप्त शासन के पाए हिल गए थे, किंतु इसने अपने निस्सीम धैर्य और अप्रतिम वीरता से शत्रुओं का सामूहिक संहार करके फिर से शांति स्थापित की। यद्यपि कुमारगुप्त का ज्येष्ठ पुत्र पुरुगुप्त था, तथापि इसके शौर्यगुण के कारण राजलक्ष्मी ने स्वयं इसका वरण किया था।

इसे राज्यकाल में हूणों ने कंबाज जनपद को विजित कर गांधार में प्रवेश किया। हूण बड़े ही भीषण योद्धा थे, जिन्होंने पश्चिम में रोमन साम्राज्य को तहस नहस कर डाला था। हूणराज एरिला का नाम सुनकर यूरोपीय लोग काँप उठते थे। कंबोज, कंधार आदि जनपद गुप्तसाम्राज्य के अंग थे। शिलालेखों में कहा गया है कि गांधार में स्कंदगुप्त (Skanda Gupta) का हूणों के साथ इतना भयंकर संग्राम हुआ कि संपूर्ण पृथ्वी काँप उठी। इस महासंग्राम में विजयश्री ने स्कंदगुप्त का वरण किया। इसका शुभ्र यश कन्याकुमारी अंतरीप तक छा गया। बौद्ध ग्रंथ 'चंद्रगर्भपरिपृच्छा' में वर्णित है कि हूणों की सैन्यसंख्या तीन लाख थी और गुप्त सैन्यसंख्या दो लाख थी, किंतु विजयी हुआ गुप्त सैन्य। इस महान् विजय के कारण गुप्तवंश में (Skanda Gupta )स्कंदगुप्त 'एकवीर' की उपाधि से विभूषित हुआ। इसने अपने बाहुबल से हूण सेना को गांधार के पीछे ढकेल दिया।

Skanda Gupta स्कंदगुप्त के समय में गुप्तसाम्राज्य अखंड रहा। इसके समय की कुछ स्वर्णमुद्राएँ मिली हैं, जिनमें स्वर्ण की मात्रा पहले के सिक्कों की अपेक्षा कम है। इससे प्रतीत होता है कि हूणयुद्ध के कारण राजकोश पर गंभीर प्रभाव पड़ा था इसने प्रजाजनों की सुख सुविधा पर भी पूरा पूरा ध्यान दिया। सौराष्ट्र की सुदर्शन झील की दशा इसके शासनकाल के आरंभ में खराब हो गई थी और उससे निकली नहरों में पानी नहीं रह गया था। स्कंदगुप्त ने सौराष्ट्र के तत्कालीन शासक पर्णदत्त को आदेश देकर झील का पुनरुद्धार कराया। बाँध दृढ़ता से बाँधे गए, जिससे प्रजाजनों का अपार सुख मिला। पर्णदत्त के पुत्र चक्रपालित ने इसी समय उस झील के तट पर विशाल विष्णुमंदिर का निर्माण कराया था।

इसने राज्य की आभ्यंतर अशांति को दूर किया और हूण जैसे प्रबल शत्रु का मानमर्दन करके 'आसमुद्रक्षितीश' पद की गौरवरक्षा करते हुए साम्राज्य में चर्तुदिक् शांति स्थापित की। स्कंदगुप्त की कोई संतान नहीं थी। अत: इसकी मृत्यु के पश्चात् पुरुगुप्त सम्राट् बना।

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